चंगाई के विषय में परमेश्वर की योजना
आज बड़ी संख्या में धार्मिक सभाओं में भीड़ जमती है। कई लोगों की इच्छा होती है कि वे अपने शारीरिक समस्याओं से किसी तरह चंगाई पाएँ। हम सभी स्वस्थ जीना चाहते हैं, पर क्या आपने कभी यह सोचा है कि मात्र चंगाई पाने से आप परमेश्वर के पास आ जाएंगे? क्या आपने इस बात पर कभी मनन की है कि हमारे ज़िंदगी में परमेश्वर के कार्य को अनुभव करने के लिए एक पवित्र जीवन की ज़रूरत है? परमेश्वर का यीशु को इस संसार में भेजने का सबसे बड़ा उद्देश्य क्या था? इन प्रशनों के बारे में हमें बाइबल के आधार पर परमेश्वर की इच्छा समझने की ज़रूरत है।

यीशु का संसार में आने का उद्देश्य
… और तू उसका नाम यीशु रखना, क्योंकि वह अपने लोगों का उनके पापों से उद्धार करेगा।” (मत्ती 1:20–21)
…यीशु ने गलील में आकर परमेश्वर के राज्य का सुसमाचार प्रचार किया। और कहा, “समय पूरा हुआ है, और परमेश्वर का राज्य निकट आ गया है; मन फिराओ और सुसमाचार पर विश्वास करो।” (मरकुस 1:14–15)
मनुष्य के जीवन में सबसे दर्दनाक बीमारी तो पाप है, यह यीशु जानते थे। इसलिए यीशु का मुख्य उद्देश्य लोगों को पापों से पश्चाताप करने के लिए बुलाना, और उन्हें स्वर्ग का रास्ता दिखाना था। वह उनके दिल के ज़ख्म (घाव) को चंगाई देकर परमेश्वर के साथ के रिश्ते को फिर से सुधारना चाहते थे।
यीशु हमें सीखाते हैं कि परमेश्वर के सामने सबसे महत्वपूर्ण क्या है। लेकिन आजकल सभाओं में पापों से मन फिराने से ज़्यादा चंगाई पर ज़ोर दिया जाता है। इस कारण हमें बाइबल से परमेश्वर की इच्छा को समझना जरूरी है।
“जो मुझसे, ‘हे प्रभु, हे प्रभु’ कहता है, उनमें से हर एक स्वर्ग के राज्य में प्रवेश न करेगा, परन्तु वही जो मेरे स्वर्गीय पिता की इच्छा पर चलता है। उस दिन बहुत लोग मुझसे कहेंगे; ‘हे प्रभु, हे प्रभु, क्या हमने तेरे नाम से भविष्यद्वाणी नहीं की, और तेरे नाम से दुष्टात्माओं को नहीं निकाला, और तेरे नाम से बहुत अचम्भे के काम नहीं किए?’ तब मैं उनसे खुलकर कह दूँगा, ‘मैंने तुम को कभी नहीं जाना, हे कुकर्म करनेवालों, मेरे पास से चले जाओ।’ (मत्ती 7: 21–23)
ऊपर वचन 22 में, यीशु आखिरी न्याय के बारे में कह रहे हैं। जो लोग उनसे, “हे प्रभु! हे प्रभु! …” कहते हैं, उन्होंने यीशु के नाम से भविष्यद्वाणी की और कई चमत्कारी कार्य भी किए। फिर भी वे स्वर्ग में प्रवेश नहीं करेंगे क्योंकि यीशु ने उन्हें कभी जाना ही नहीं था। क्यों? क्योंकि उन्होंने परमेश्वर की इच्छा नहीं की। इन वचनों में भी चेतावनी दी गई है कि हमें चमत्कारों से जल्द प्रभावित नहीं होना चाहिए भले ही वे यीशु के नाम पर किए गए होने का दावा करते हो , बल्कि लोगों के फलों से हम झूठे और सही भविष्यद्वक्ताओं को परख पाएंगे। यहाँ यह बात तो साफ़ है कि उनके चमत्कार करने के बावजूद भी यीशु उनपर दण्ड की आज्ञा देते हैं। यीशु उनके जीवन में कुछ और फल चाह रहे थे।
“झूठे भविष्यद्वक्ताओं से सावधान रहो, जो भेड़ों के भेष में तुम्हारे पास आते हैं, परन्तु अन्तर में फाड़नेवाले भेड़िए हैं। उनके फलों से तुम उन्हें पहचान लोगे। क्या लोग झाड़ियों से अंगूर, या ऊँटकटारों से अंजीर तोड़ते हैं? (मत्ती 7:15–16)
ऐसे विख्यात चमत्कार करने वाले और प्रचारकों के बारे में हमें पता है कि वे कितने अमीरी और ठाठ से जीते हैं (1 यूहन्ना 3:17), पैसों पर ज़ोर देते हैं (1 तिमुथियुस 6:6–10), लोगों से सम्मान चाहते हैं (यूहन्ना 5:44, मरकुस 12:38–40), दुनिया-दारी से अलग नहीं होते (1 यूहन्ना 2:15–17), और वे इतने व्यस्त होते हैं कि कोई करीबी रिश्ता तो उनके साथ रख पाना असंभव ही है (तुलना करें पौलुस से:-
1 थिस्सलुनीकियों 2:4–12)।
यदि तेरे बीच कोई भविष्यद्वक्ता या स्वप्न देखनेवाला प्रकट होकर तुझे कोई चिन्ह या चमत्कार दिखाए, और जिस चिन्ह या चमत्कार को प्रमाण ठहराकर वह तुझसे कहे, ‘आओ हम पराए देवताओं के अनुयायी होकर, जिनसे तुम अब तक अनजान रहे, उनकी पूजा करें,’ तब तुम उस भविष्यद्वक्ता या स्वप्न देखनेवाले के वचन पर कभी कान न रखना; क्योंकि तुम्हारा परमेश्वर यहोवा तुम्हारी परीक्षा लेगा, जिससे यह जान ले, कि ये मुझसे अपने सारे मन और सारे प्राण के साथ प्रेम रखते हैं या नहीं ?… (व्यवस्थाविवरण 13:1–5)
भले ही चमत्कारी चिन्ह या अजूबे किए गए हो हमें हमेशा हर व्यक्ति के शिक्षाओं को जाँचना चाहिए। आजकल, कोई प्रचारक नहीं कहेगा, “आओ हम पराए देवताओं … की पूजा करें …,” लेकिन अगर वह यीशु या प्रेरितओं के शिक्षा से कुछ अलग सिखाए तो हमें उनसे सावधान रहना चाहिए।
एक उदाहरण:- कई जगहों पर यीशु की माँ मरियम के नाम पर चमत्कार होने का दावा किया जाता है। ऐसे लोग साथ‑ही-साथ यीशु की भी आराधना करते है और मसीही कहलाते हैं। लेकिन क्या यह सही है? ऊपर बताए गए व्यवस्थाविवरण के वचन से हम यह देखते हैं कि परमेश्वर के सामने किसी व्यक्ति के चमत्कारी चिन्ह के मुकाबले उनका जीवन और उनकी शिक्षा को परखना ज़्यादा ज़रूरी है।
कई बार तो उनके व्यक्तिगत जीवन को जान पाना ही आसान नहीं होता; इसलिए, हमें उनकी शिक्षाओं को बाइबिल के आधार पर जाँचना ज़रूरी है।
भाइयों ने तुरन्त रात ही रात पौलुस और सीलास को बिरीया में भेज दिया, और वे वहाँ पहुँचकर यहूदियों के आराधनालय में गए। ये लोग तो थिस्सलुनीके के यहूदियों से भले थे और उन्होंने बड़ी लालसा से वचन ग्रहण किया, और प्रतिदिन पवित्रशास्त्रों में ढूँढ़ते रहे कि ये बातें ऐसी ही हैं कि नहीं। (प्रेरित 17:10–11)
बिरीया के लोग अच्छे स्वभाव के थे क्योंकि उन्होंने पौलुस की शिक्षाओं को जाँचा कि वे सही है कि नहीं। हमें भी किसी पर भरोसा करने या उनका अनुसरण करने से पहले यही करना चाहिए। कुछ चंद शिक्षाओं में सहमती, जैसे “यीशु जगत का उद्धारकर्ता है, वह स्वयं ही परमेश्वर है या त्रिएक परमेश्वर पर विश्वास” काफी नहीं है, बल्कि हमें परमेश्वर के पूर्ण इच्छा को देखना ज़रूरी है। जैसे पौलुस ने इफिसियों के प्राचीनों से कहा था :-
इसलिए मैं आज के दिन तुम से गवाही देकर कहता हूँ, कि मैं सब के लहू से निर्दोष हूँ। क्योंकि मैं परमेश्वर की सारी मनसा को तुम्हें पूरी रीति से बताने से न झिझका। (प्रेरित 20:26–27)
अगर पौलुस ने परमेश्वर की सम्पूर्ण इच्छा के बारे में नहीं बताया होता, तो वह उनके लहू से निर्दोष नहीं ठहरता, अर्थात वह उन्हें अनंत जीवन का मार्ग नहीं बता रहा होता।
“क्योंकि झूठे मसीह और झूठे भविष्यद्वक्ता उठ खड़े होंगे, और बड़े चिन्ह और अद्भुत काम दिखाएँगे, कि यदि हो सके तो चुने हुओं को भी बहका दें। देखो, मैंने पहले से तुम से यह सब कुछ कह दिया है। (मत्ती 24:24–25)
उस अधर्मी का आना शैतान के कार्य के अनुसार सब प्रकार की झूठी सामर्थ्य, चिन्ह, और अद्भुत काम के साथ। और नाश होनेवालों के लिये अधर्म के सब प्रकार के धोखे के साथ होगा; क्योंकि उन्होंने सत्य के प्रेम को ग्रहण नहीं किया जिससे उनका उद्धार होता। (2 थिस्सलुनीकियों 2:9–10)
यह आखिरी वचन न केवल धोखा देने वालों की ज़िम्मेदारी और अपराध को दिखाता हैं, बल्कि उनकी भी जो उन पर विश्वास करते हैं। कोई भी झूठे भविष्यवक्ताओं पर दोष नहीं डाल पाएंगे कि उन्होंने हमें धोखा दिया। उन पर दंड तो सचमुच घोर होगा, लेकिन परमेश्वर ने हम में से हर एक को अच्छे और बुरे में भेद करने की काबिलियत दी है। हमारे पास बाइबल है — यदि हम खुले मन के हो और सत्य से प्रेम करें तो वह हमारा मार्गदर्शन करेगी। इसलिए बाइबल जानने और उससे लिपटे रहने से ही हम किसी भी झूटी शिक्षा से बचे रह सकते है।
सब बातों को परखो जो अच्छी है उसे पकड़े रहो। सब प्रकार की बुराई से बचे रहो। (1 थिस्सलुनीकियों 5:21–22)
यीशु की चँगाईयाँ
यीशु ने लोगों को पूर्ण रूप से चंगा किया और इस विषय में किसी को कोई संदेह न था, इन चमत्कारों में हम परमेश्वर का हाथ साफ देखते हैं। यह बात कई वचनों में स्पष्ट है:-
यीशु ने सभी को चंगा किया
जब संध्या हुई तब वे उसके पास बहुत से लोगों को लाए जिनमें दुष्टात्माएँ थीं और उसने उन आत्माओं को अपने वचन से निकाल दिया, और सब बीमारों को चंगा किया। (मत्ती 8:16)
जब संध्या हुई तब वे उसके पास बहुत से लोगों को लाए जिनमें दुष्टात्माएँ थीं और उसने उन आत्माओं को अपने वचन से निकाल दिया, और सब बीमारों को चंगा किया। (मत्ती 8:16)
… उससे विनती करते थे, कि वह उन्हें अपने वस्त्र के आँचल ही को छू लेने दे: और जितने उसे छूते थे, सब चंगे हो जाते थे। (मरकुस 6:53–56)
जैसा कि हम इन वचनों में देख सकते हैं यीशु ने केवल कुछ को ही नहीं, सभी बीमारों को चंगा किया। जो कोई किसी भी बीमारी के साथ चंगा होने की आशा में उनके पास गया, उसने वास्तव में ही चंगाई पायी। आजकल की सभाओं में यह देखकर बहुत दुख होता है कि बहुत से बीमार लोग आशा और अपेक्षा के साथ सभाओं में आते तो हैं, लेकिन उन्हें उसी हालत में घर वापस जाना पड़ता है। “चमत्कारी” आमतौर पर बीमार व्यक्ति के विश्वास की कमी का कारण देते हैं। हालाँकि, यीशु ने ऐसे लोगों को भी चंगा किया जिन्होंने अपने बाद के कार्यों से दिखाया कि उनमें दृढ़ विश्वास नहीं था। जैसे, लूका 17:11–19 – हालाँकि दस कोढ़ी चंगे हुए थे लेकिन सिर्फ़ एक ही को विश्वास था।
और ऐसा हुआ कि वह यरूशलेम को जाते हुए सामरिया और गलील प्रदेश की सीमा से होकर जा रहा था। और किसी गाँव में प्रवेश करते समय उसे दस कोढ़ी मिले। और उन्होंने दूर खड़े होकर, ऊँचे शब्द से कहा, “हे यीशु, हे स्वामी, हम पर दया कर!”
उसने उन्हें देखकर कहा, “जाओ; और अपने आपको याजकों को दिखाओ।” और जाते ही जाते वे शुद्ध हो गए। तब उनमें से एक यह देखकर कि मैं चंगा हो गया हूँ, ऊँचे शब्द से परमेश्वर की बड़ाई करता हुआ लौटा; और यीशु के पाँवों पर मुँह के बल गिरकर उसका धन्यवाद करने लगा; और वह सामरी था। इस पर यीशु ने कहा, “क्या दसों शुद्ध न हुए, तो फिर वे नौ कहाँ हैं? क्या इस परदेशी को छोड़ कोई और न निकला, जो परमेश्वर की बड़ाई करता?” तब उसने उससे कहा, “उठकर चला जा; तेरे विश्वास ने तुझे चंगा किया है।” लूका 17:11–19
दस के दस ने तो चंगाई पायी थी, फिर भी यीशु केवल एक ही के विश्वास को सराहते है जो उनके पास परमेश्वर की स्तुति करता हुआ वापस आया था। इस परिस्थिति से हम देखते है कि यीशु ने उनसे विशेष विश्वास की अपेक्षा नहीं की थी। यदि लोग विश्वास और आशा रखते कि यीशु उन्हें चंगा कर सकते हैं तो यही काफी था।
हम कभी ऐसा विवरण नहीं देखते हैं कि उन्होंने किसी को ठीक करने की कोशिश की होगी पर उस व्यक्ति का पर्याप्त विश्वास न होने के कारण नहीं कर सकें। यीशु ने कभी लोगों के साथ ऐसा व्यवहार नहीं किया कि पहले उन्हें आशा दी पर बाद में चंगा करने में असफल ठहरे।
आजकल के प्रचारक, अक्सर असफल चमत्कारों को यह कहते हुए समझा देते हैं कि यह परमेश्वर की इच्छा नहीं थी। लेकिन यदि चंगाई परमेश्वर की इच्छा में नहीं थी, तो प्रयास ही क्यों किया गया? यीशु या यीशु के बाद में प्रेरितों ने ऐसे असफल प्रयास कभी नहीं किए।
चमत्करी कभी-कभी लोगों के विश्वास की कमी का वास्ता देते है। वे कहते है कि यीशु ने भी लोगों की विश्वास के कमी के कारण बहुत चमत्कार नहीं किये थे, जैसे:-
जब यीशु ये सब दृष्टान्त कह चुका, तो वहाँ से चला गया। और अपने नगर में आकर उनके आराधनालय में उन्हें ऐसा उपदेश देने लगा; कि वे चकित होकर कहने लगे, “इसको यह ज्ञान और सामर्थ्य के काम कहाँ से मिले? क्या यह बढ़ई का बेटा नहीं? और क्या इसकी माता का नाम मरियम और इसके भाइयों के नाम याकूब, यूसुफ, शमौन और यहूदा नहीं? और क्या इसकी सब बहनें हमारे बीच में नहीं रहती? फिर इसको यह सब कहाँ से मिला?” इस प्रकार उन्होंने उसके कारण ठोकर खाई, पर यीशु ने उनसे कहा, “भविष्यद्वक्ता अपने नगर और अपने घर को छोड़ और कहीं निरादर नहीं होता।” और उसने वहाँ उनके अविश्वास के कारण बहुत सामर्थ्य के काम नहीं किए। (मत्ती 13:53–58)
जैसा कि हम देखते हैं, नासरत का अविश्वास बहुत स्पष्ट था:- “… उन्होंने उसके कारण ठोकर खाई”। यहाँ विश्वास की कमी यीशु के प्रति उनके नकारात्मक और संदेहपूर्ण रवैये को दर्शाता है, और इसके कारण यीशु को उन्हें मदद करने का मौका ही नहीं मिला। उनका रवैया देखकर यीशु उनमें चमत्कार करना ही नहीं चाहते थें। यहाँ मामला आज की असफल चँगाईयों से बहुत अलग था।
यीशु की चँगाईयाँ पूरी और स्पष्ट भी थी
जिन बीमारियों को यीशु ने चंगा किया था, और जिनके बारे में हम सुसमाचारों में विस्तृत विवरण पढ़तें है, वे ज़्यादातर बहुत गंभीर बीमारियाँ थीं:- अंधापन (वो भी जन्म से), गूंगापन, कुष्ठ रोग, आंतरिक रक्तस्राव (12 वर्ष तक), लकवा (38 वर्ष तक) आदि। सुसमाचारों में हम ऐसे तीन विवरण भी पढ़ते है, जिनमें उन्होंने लोगों को मरे हुओं में से जिलाया। सभी मामले इतने स्पष्ट थे कि यीशु के दुश्मन भी उन्हें नकार नहीं सके, हालाँकि उन्होंने यीशु को झूठा साबित करने की बहुत कोशिश की थी। उदाहरण के लिए, जब यीशु ने लाजर को जिलाया, जिसे मरे हुए चार दिन हो गए थे, तो चमत्कार इतना स्पष्ट था कि यहूदी सरदार दुविधा में पड़ गए कि क्या करें:-
यह कहकर उसने बड़े शब्द से पुकारा, “हे लाज़र, निकल आ!” जो मर गया था, वह कफन से हाथ पाँव बंधे हुए निकल आया और उसका मुँह अँगोछे से लिपटा हुआ था। यीशु ने उनसे कहा, “उसे खोलकर जाने दो।” तब जो यहूदी मरियम के पास आए थे, और उसका यह काम देखा था, उनमें से बहुतों ने उस पर विश्वास किया। परन्तु उनमें से कितनों ने फरीसियों के पास जाकर यीशु के कामों का समाचार दिया। इस पर प्रधान याजकों और फरीसियों ने मुख्य सभा के लोगों को इकट्ठा करके कहा, “हम क्या करेंगे? यह मनुष्य तो बहुत चिन्ह दिखाता है। यदि हम उसे ऐसे ही छोड़ दे, तो सब उस पर विश्वास ले आएँगे और रोमी आकर हमारी जगह और जाति दोनों पर अधिकार कर लेंगे।”[…] अतः उसी दिन से वे उसके मार डालने की साज़िश रचने लगे। (यूहन्ना 11:43–48; 53)
और बाद में यीशु के शत्रुओं ने लाज़र को भी मारने की कोशिश की, ताकि ऐसे स्पष्ट चमत्कार के सारे सबूत मिटा सके। (यूहन्ना 12:9–11)
एक अन्य स्थिति में, जब यीशु ने एक जन्म से अंधे व्यक्ति को चंगा किया, तो फरीसियों ने चमत्कार का खंडन करने की कोशिश की, लेकिन सफल नहीं हुए। (यूहन्ना 9:17–20)
पवित्र आत्मा प्राप्त करने के बाद, हम पढ़ते हैं कि पतरस और यूहन्ना ने एक लंगड़े को चंगा किया (प्रेरित 3:1–11) जो सभी के नज़रों में स्पष्ट था ।
पतरस और यूहन्ना तीसरे पहर प्रार्थना के समय मन्दिर में जा रहे थे। और लोग एक जन्म के लँगड़े को ला रहे थे, जिसको वे प्रतिदिन मन्दिर के उस द्वार पर जो ‘सुन्दर’ कहलाता है, बैठा देते थे, कि वह मन्दिर में जानेवालों से भीख माँगे। जब उसने पतरस और यूहन्ना को मन्दिर में जाते देखा, तो उनसे भीख माँगी। पतरस ने यूहन्ना के साथ उसकी ओर ध्यान से देखकर कहा, “हमारी ओर देख!” अतः वह उनसे कुछ पाने की आशा रखते हुए उनकी ओर ताकने लगा। तब पतरस ने कहा, “चाँदी और सोना तो मेरे पास है नहीं; परन्तु जो मेरे पास है, वह तुझे देता हूँ; यीशु मसीह नासरी के नाम से चल फिर।” और उसने उसका दाहिना हाथ पकड़ के उसे उठाया; और तुरन्त उसके पाँवों और टखनों में बल आ गया। और वह उछलकर खड़ा हो गया, और चलने-फिरने लगा; और चलता, और कूदता, और परमेश्वर की स्तुति करता हुआ उनके साथ मन्दिर में गया। सब लोगों ने उसे चलते-फिरते और परमेश्वर की स्तुति करते देखकर, उसको पहचान लिया कि यह वही है, जो मन्दिर के ‘सुन्दर’ फाटक पर बैठ कर भीख माँगा करता था; और उस घटना से जो उसके साथ हुई थी; वे बहुत अचम्भित और चकित हुए। जब वह पतरस और यूहन्ना को पकड़े हुए था, तो सब लोग बहुत अचम्भा करते हुए उस ओसारे में जो सुलैमान का कहलाता है, उनके पास दौड़े आए। (प्रेरित 3:1–11)
प्रेरितों के काम 4:1–22 में हम पढ़ते हैं कि धर्मगुरुओं ने प्रेरितों के उपदेशों के कारण उनसे सवाल करने और उन्हें दंडित करने का प्रयास किया। लेकिन वे भी उस चंगाई के विरोध में कुछ कह न सके (प्रेरित 4:21–22)।
जैसा कि ऊपर उल्लेख किया गया है, जिन बीमारियों को यीशु या प्रेरितों ने ठीक किया था वे बहुत गंभीर थीं और चंगाई सभी के लिए स्पष्ट थी। लेकिन आजकल, हम ज़्यादातर ऐसी बीमारियों से स्वस्थ होने के बारे में सुनते हैं जो ज़्यादा स्पष्ट नहीं हैं। कई बार ऐसा भी सुनने में आता है कि चंगाईयाँ पहले से ही आयोजित की गई थी या बाद में नकली साबित हुई। इसके अलावा, ये जान पाना भी मुश्किल है कि स्वस्थता कितने समय तक टिकी।
यीशु ने चमत्कारों को क्या स्थान दिया ?
और भोर को दिन निकलने से बहुत पहले, वह उठकर निकला, और एक जंगली स्थान में गया और वहाँ प्रार्थना करने लगा। तब शमौन और उसके साथी उसकी खोज में गए। जब वह मिला, तो उससे कहा; “सब लोग तुझे ढूँढ़ रहे हैं।” यीशु ने उनसे कहा, “आओ; हम और कहीं आस‑पास की बस्तियों में जाएँ, कि मैं वहाँ भी प्रचार करूँ, क्योंकि मैं इसलिए निकला हूँ।” और वह सारे गलील में उनके आराधनालयों में जा जाकर प्रचार करता और दुष्टात्माओं को निकालता रहा। (मरकुस 1:35–39)
यीशु ने लोगों को अपने पीछे होने के लिए बुलाया कि वे आत्मत्याग और अपने पापमय जीवन के लिए मरकर, पवित्र आत्मा के द्वारा नया जीवन पाए (इफिसियों 4:22–24)। इस प्रकार की चंगाई यीशु ने लोगों को देनी चाही, क्योंकि यीशु जानते थे कि यदि लोगों को शारीरिक चंगाई और भूख से तृप्ति मिल भी जाए, फिर भी उनका जीवन यीशु के मार्ग पर चलने से ही सुधर सकता है। यीशु अपने चमत्कारों/चँगाईयों के द्वारा यह दिखाना चाहते थे कि परमेश्वर के द्वारा भेजे गए उद्धारकर्ता वे खुद है और आने वाले स्वर्गीय जीवन में कोई दु:ख‑दर्द नहीं होगा। (प्रकाशितवाक्य 21:4)
यीशु कभी नहीं चाहते थे कि उनके पीछे चलने वाले उनके मुख्य सन्देश को न समझकर सिर्फ उनके चमत्कारों से चकित हो जाए क्योंकि यीशु जानते थे कि इस प्रकार का विश्वास गहरा नहीं है और सिर्फ थोड़े समय का है।
जब वह यरूशलेम में फसह के समय, पर्व में था, तो बहुतों ने उन चिन्हों को जो वह दिखाता था देखकर उसके नाम पर विश्वास किया। परन्तु यीशु ने अपने आप को उनके भरोसे पर नहीं छोड़ा, क्योंकि वह सब को जानता था, और उसे प्रयोजन न था कि मनुष्य के विषय में कोई गवाही दे, क्योंकि वह आप जानता था कि मनुष्य के मन में क्या है? (यूहन्ना 2:23–25)
बाद में (यूहन्ना 6 में) यह बात बहुत ही साफ दिखाई देती है:-
जब भीड़ ने देखा, कि यहाँ न यीशु है, और न उसके चेले, तो वे भी छोटी-छोटी नावों पर चढ़ के यीशु को ढूँढ़ते हुए कफरनहूम को पहुँचे। और झील के पार उससे मिलकर कहा, “हे रब्बी, तू यहाँ कब आया?” यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “मैं तुम से सच-सच कहता हूँ, तुम मुझे इसलिए नहीं ढूँढ़ते हो कि तुम ने अचम्भित काम देखे, परन्तु इसलिए कि तुम रोटियाँ खाकर तृप्त हुए। नाशवान भोजन के लिये परिश्रम न करो, परन्तु उस भोजन के लिये जो अनन्त जीवन तक ठहरता है, जिसे मनुष्य का पुत्र तुम्हें देगा, क्योंकि पिता, अर्थात् परमेश्वर ने उसी पर छाप कर दी है।” उन्होंने उससे कहा, “परमेश्वर के कार्य करने के लिये हम क्या करें?” यीशु ने उन्हें उत्तर दिया, “परमेश्वर का कार्य यह है, कि तुम उस पर, जिसे उसने भेजा है, विश्वास करो।” तब उन्होंने उससे कहा, “फिर तू कौन सा चिन्ह दिखाता है कि हम उसे देखकर तुझ पर विश्वास करें? तू कौन सा काम दिखाता है? हमारे पूर्वजों ने जंगल में मन्ना खाया; जैसा लिखा है, ‘उसने उन्हें खाने के लिये स्वर्ग से रोटी दी’।” यीशु ने उनसे कहा, “मैं तुम से सच-सच कहता हूँ कि मूसा ने तुम्हें वह रोटी स्वर्ग से न दी, परन्तु मेरा पिता तुम्हें सच्ची रोटी स्वर्ग से देता है। क्योंकि परमेश्वर की रोटी वही है, जो स्वर्ग से उतरकर जगत को जीवन देती है।” तब उन्होंने उससे कहा, “हे स्वामी, यह रोटी हमें सर्वदा दिया कर।” यीशु ने उनसे कहा, “जीवन की रोटी मैं हूँ: जो मेरे पास आएगा वह कभी भूखा न होगा और जो मुझ पर विश्वास करेगा, वह कभी प्यासा न होगा।
(यूहन्ना 6:24–35)
जब यीशु ने यह देखा कि लोगों की रुचि भौतिक भोजन में है तब उन्होंने लोगों का ध्यान आत्मिक भोजन की ओर खींचना चाहा। उस वक़्त उनके बहुत से उत्साही चेले उन्हें छोड़कर चले गए।
… इसलिए उसके चेलों में से बहुतों ने यह सुनकर कहा, “यह तो कठोर शिक्षा है; इसे कौन मान सकता है?” यीशु ने अपने मन में यह जानकर कि मेरे चेले आपस में इस बात पर कुड़कुड़ाते हैं, उनसे पूछा, “क्या इस बात से तुम्हें ठोकर लगती है? और यदि तुम मनुष्य के पुत्र को जहाँ वह पहले था, वहाँ ऊपर जाते देखोगे, तो क्या होगा? आत्मा तो जीवनदायक है, शरीर से कुछ लाभ नहीं। जो बातें मैंने तुम से कहीं हैं वे आत्मा है, और जीवन भी हैं।
[…] इस पर उसके चेलों में से बहुत सारे उल्टे फिर गए और उसके बाद उसके साथ न चले। (यूहन्ना 6:57–58; 59–63; 66)
भले ही यीशु के लिए अपने चेले खो देना मुश्किल था, फिर भी वे अपने चेलों को अपने पीछे हो लेने की कीमत बताने से पीछे नहीं हटे।
बाइबल के अन्य चमत्कार
बाइबल में चिन्ह और चमत्कार हर काल में नहीं हुए बल्कि विशेष परिस्थितियों में ही किए गए। जैसे कि मूसा के समय में, एलिय्याह व एलीशा के समय में और यीशु व प्रेरितों के समय में।
ये सब परमेश्वर के राज्य इस्राएल के इतिहास में बहुत ही महत्वपूर्ण घटनाएं थीं। मूसा का समय एक नई वाचा का और इस्राएल देश की शुरुआत का समय था। दस महामारियाँ और लाल समुद्र को पार करना इस्राएलियों के लिए बहुत ही अनोखा अनुभव था।
इस प्रकार यहोवा ने उस दिन इस्राएलियों को मिस्रियों के वश से इस प्रकार छुड़ाया; और इस्राएलियों ने मिस्रियों को समुद्र के तट पर मरे पड़े हुए देखा। और यहोवा ने मिस्रियों पर जो अपना पराक्रम दिखलाता था, उसको देखकर इस्राएलियों ने यहोवा का भय माना और यहोवा की और उसके दास मूसा की भी प्रतीति की (अर्थात्, विश्वास किया)। (निर्गमन 14:30–31)
एलिय्याह और एलीशा के समय में इस्राइलियों की आत्मिक परिस्थिति बहुत ही नाज़ुक थी। यीशू और प्रेरितों के द्वारा नई वाचा एवं एक नए इस्राएल की शुरुआत हुई। इन विशेष समयों में परमेश्वर चिन्ह‑चमत्कारों के द्वारा लोगों को विश्वास करने के लिए मदद करना चाहते थे।
परमेश्वर ने हर युग में तो चिन्ह‑चमत्कार नहीं किए बल्कि, वे चाहते थें कि लोग अपने अनुभवों को अपने बच्चों के साथ बाटें और पीढ़ी-दर‑पीढ़ी याद रखें।
“यह अत्यन्त आवश्यक है कि तुम अपने विषय में सचेत रहो, और अपने मन की बड़ी चौकसी करो, कहीं ऐसा न हो कि जो-जो बातें तुमने अपनी आँखों से देखीं उनको भूल जाओ, और वह जीवन भर के लिये तुम्हारे मन से जाती रहें; किन्तु तुम उन्हें अपने बेटों पोतों को सिखाना।
(व्यवस्था विवरण 4:9)
महान कार्य बार‑बार दोहराए नहीं गए। परमेश्वर चाहते थे कि लोग गवाहियों के द्वारा विश्वास करें। इसी प्रकार जो चमत्कार यीशु और उनके प्रेरितों ने कियें वे नए नियम में लिखे गए हैं ताकि हर आने वाली पीढ़ी उसे पढ़कर विश्वास करें भले ही हम उन चमत्कारों को अपनी आँखों से नहीं देख पाए। जिस तरह यूहन्ना भी अपने सुसमाचार के अंत में बताते हैं:-
यीशु ने और भी बहुत चिन्ह चेलों के सामने दिखाएं, जो इस पुस्तक में लिखे नहीं गए। परन्तु ये इसलिए लिखे गए हैं, कि तुम विश्वास करो, कि यीशु ही परमेश्वर का पुत्र मसीह है: और विश्वास करके उसके नाम से जीवन पाओ। (यूहन्ना 20:30–31)
यूहन्ना के इस बात को लिखने के पहले एक घटना घटी थी, जहाँ यीशु का शिष्य थोमा उन के जी उठने की बात को अपनी आँखों से देखे बगैर विश्वास नहीं कर रहा था। तब यीशु कहते हैं:-
… तब उसने थोमा से कहा, “अपनी उंगली यहां लाकर मेरे हाथों को देख और अपना हाथ लाकर मेरे पंजर में डाल और अविश्वासी नहीं परन्तु विश्वासी हो।” यह सुन थोमा ने उत्तर दिया, “हे मेरे प्रभु, हे मेरे परमेश्वर!” यीशु ने उससे कहा, “तूने तो मुझे देखकर विश्वास किया है? धन्य हैं वे जिन्होंने बिना देखे विश्वास किया।” (यूहन्ना 20:24–29)
यीशु यह नहीं चाहते थे कि थोमा बिना समझे विश्वास करे। थोमा के पास सबूत काफी था कि वह दूसरों की गवाही के द्वारा यीशु के जी उठने पर विश्वास करे। यह बात आज हम पर भी लागू होती है कि हम परमेश्वर के चमत्कारों पर पवित्र शास्त्र की गवाही के द्वारा विश्वास करें। इसके लिए हम, और अधिक चिन्हों की मांग न करें।
चमत्कारों के अलावा अन्य महत्वपूर्ण चिन्ह
आजकल किसी उपदेशक, पास्टर या मंडली (चर्च) के सही होने का प्रमाण (सबूत) अक्सर उनके चमत्कारों के आधार पर किया जाता है। हालांकि, जैसे हमने देखा, चमत्कारों की नकल की जा सकती है और उनका दुरुपयोग कर, परमेश्वर की ओर से होने का दावा किया जाता है। इसके कारण कई लोग धोखा खा जाते है, इसलिए ऐसी बातें सुनने या देखने पर हमें बहुत सतर्क रहना चाहिए।
लेकिन यीशु ने इनके अलावा कुछ और चिन्हों के बारे में भी बताया जिनके द्वारा एक सच्चा विश्वासी यह पहचान सके कि जो परमेश्वर से होने का दावा करते हैं, वे वास्तव में परमेश्वर के लोग है या नहीं।
मैं तुम्हें एक नई आज्ञा देता हूँ, कि एक दूसरे से प्रेम रखो जैसा मैंने तुम से प्रेम रखा है, वैसा ही तुम भी एक दूसरे से प्रेम रखो। यदि आपस में प्रेम रखोगे तो इसी से सब जानेंगे, कि तुम मेरे चेले हो।” (यूहन्ना 13:34–35)
भाईचारे-प्रेम की नकल नहीं की जा सकती। यीशु के प्रेम के जैसे ही एक दूसरे से प्रेम करने के लिए हमें ईश्वर के प्रति पूर्ण समर्पण और सह विश्वासियों के आत्मिक जीवन में गहरी रुचि होनी चाहिए।
पहले मसीहयों के तरह ही सच्चे मसीही लोग संगति और भाइचारे की प्रीति में जीते हैं और एक दूसरे के लिए अपना जीवन प्रतिदिन समर्पित करते हैं। आजकल ऐसे कई चर्च हैं, जहाँ बड़े चमत्कार होने का दावा तो किया जाता है पर वहाँ भाईचारे का प्रेम नहीं दिखता। उदाहरण के लिए, अगर जो लोग अमीर हैं वे गरीबों के इलाज के लिए या फिर स्वच्छ एवं स्वस्थ परिस्थितियों में रहने के लिए उन्हें मदद करें तो शायद कई बीमारियों से वे बचे रह सकते हैं। इसके अलावा, यदि विश्वासी अपने बीमार भाई‑बहनों को प्रेम, देखभाल और आत्मिक प्रोत्साहन से संभाले रखें तो वे धैर्य और कृतज्ञता (शुक्रगुज़ारी) के साथ अपने दुख को सहन कर पाएंगे।
पर मैंने इपफ्रुदीतुस को जो मेरा भाई, … है, तुम्हारे पास भेजना अवश्य समझा। क्योंकि उसका मन तुम सब में लगा हुआ था, इस कारण वह व्याकुल रहता था क्योंकि तुम ने उसकी बीमारी का हाल सुना था। और निश्चय वह बीमार तो हो गया था, यहाँ तक कि मरने पर था, परन्तु परमेश्वर ने उस पर दया की; और केवल उस पर ही नहीं, पर मुझ पर भी कि मुझे शोक पर शोक न हो। इसलिए मैंने उसे भेजने का और भी यत्न किया कि तुम उससे फिर भेंट करके आनन्दित हो जाओ और मेरा भी शोक घट जाए। इसलिए तुम प्रभु में उससे बहुत आनन्द के साथ भेंट करना, और ऐसों का आदर किया करना, क्योंकि वह मसीह के काम के लिये अपने प्राणों पर जोखिम उठाकर मरने के निकट हो गया था, ताकि जो घटी तुम्हारी ओर से मेरी सेवा में हुई उसे पूरा करे। (फिलिप्पियों 2:25–30)
यहाँ पौलुस ने अद्भुत रूप से इपफ्रुदीतुस को चंगा नहीं किया। प्रेरितों और दूसरे मसीहयों ने अपने चमत्कार या चंगा करने के वर को परमेश्वर की इच्छानुसार ही इस्तमाल किया। अपने बीमार भाइयों के लिए प्रार्थना करना और प्रेम से उनको सहारा देना ही परमेश्वर की इच्छा थी। एक दूसरे के प्रति यह प्रेम ही संसार के लिए एक स्पष्ट चिन्ह है कि यीशु विश्वासियों के बीच मौजूद है।
चमत्कारों के अलावा एक और महत्वपूर्ण चिन्ह है — विश्वासियों की एकता।
“मैं केवल इन्हीं के लिये विनती नहीं करता, परन्तु उनके लिये भी जो इनके वचन के द्वारा मुझ पर विश्वास करेंगे, कि वे सब एक हों; जैसा तू हे पिता मुझ में हैं, और मैं तुझ में हूँ, वैसे ही वे भी हम में हों, इसलिए कि जगत विश्वास करे, कि तू ही ने मुझे भेजा। (यूहन्ना 17:20–21)
यीशु ने इन वचनों के पहले अपने शिष्यों के लिए प्रार्थना की थी। इन वचनों में यीशु ने भविष्य के विश्वासियों के लिए भी प्रार्थना की कि वे एक हों जैसे वह पिता के साथ एक हैं। यह एकता तभी संभव हो सकती है जब प्रत्येक विश्वासी यीशु के अधीन होने एवं खुद के विचारों और इच्छाओं को त्यागने के लिए तैयार हो। सिर्फ कुछ ही चीज़ो में सहमत होना काफी नहीं है, जैसे — परमेश्वर त्रिएक है, बाइबल ही परमेश्वर का वचन है, आदि। जिस एकता के लिए यीशु ने यूहन्ना 17 में प्रार्थना की थी वह सिर्फ यही तक सीमित नहीं है, क्योंकि ऐसी सहमति या ऊपरी सतह की एकता, संसार में भी पाई जा सकती है। सच्चे विश्वासियों के बीच की एकता की विशेषता यह है कि वे वास्तव में एक दिल और एक मन के हैं।
इस एकता तक पहुँचने और उसमे बने रहने के लिए मसीही भाई‑बहन एक दूसरे को गहराई से जानने का यत्न करते हैं और एक दूसरे के साथ समय बिताते हैं, यानी एक दूसरे से यीशु की तरह प्रेम करना। इस गहरी एकता की नकल करना असंभव है, यही मसीहियों के बीच परमेश्वर के उपस्थिती एवं कार्यशीलता का स्पष्ट चिन्ह है।
निष्कर्ष
हमें “यीशु के नाम” में किए जाने वाले चिन्ह‑चमत्कारों से धोखा नहीं खाना चाहिए। आइए हम परमेश्वर के कार्य के सही चिन्हों की तलाश करें:- उनके वचन के प्रति आज्ञाकारिता, विनम्रता, पवित्र जीवन, भाईचारे का प्रेम, एकता …।
प्रिय बालकों, किसी के भरमाने में न आना; जो धार्मिकता का काम करता है, वही उसके समान धर्मी है। जो कोई पाप करता है, वह शैतान की ओर से है, क्योंकि शैतान आरम्भ ही से पाप करता आया है। परमेश्वर का पुत्र इसलिए प्रगट हुआ, कि शैतान के कामों को नाश करे। जो कोई परमेश्वर से जन्मा है वह पाप नहीं करता; क्योंकि उसका बीज उसमें बना रहता है: और वह पाप कर ही नहीं सकता, क्योंकि वह परमेश्वर से जन्मा है। इसी से परमेश्वर की सन्तान, और शैतान की सन्तान जाने जाते हैं; जो कोई धार्मिकता नहीं करता, वह परमेश्वर से नहीं, और न वह जो अपने भाई से प्रेम नहीं रखता। (1 यूहन्ना 3:7–10)